Mar 30, 2026

30 छात्रविहीन मदरसों पर गिरेगी गाज? डॉ. गांधी ने दिए मान्यता रद्द करने के संकेत

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देहरादून। उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव आने वाला है। उत्तराखंड मदरसा बोर्ड एक जुलाई 2026 से समाप्त हो रहा है। इसके साथ ही राज्य के 54 मान्यता प्राप्त मदरसों में से 30 मदरसों में मुंशी (हाईस्कूल स्तर) और आलिम (इंटर स्तर) पर एक भी छात्र नहीं है। शेष 24 मदरसों में भी इन कक्षाओं में छात्रों की संख्या बेहद कम है। यह स्थिति मदरसा बोर्ड के खत्म होने की अनिश्चितता के कारण पैदा हुई है। मदरसा आईशा सिद्दीका लंढौरा के प्रबंधक अब्दुस्लाम ने बताया कि छात्र-छात्राओं ने बोर्ड समाप्त होने के डर से मुंशी और आलिम स्तर पर दाखिला नहीं लिया। प्रदेश में कुल 452 मदरसे हैं, जिनमें से 54 मदरसों को नौवीं से बारहवीं तक की मान्यता प्राप्त है। शैक्षिक सत्र 2025-26 में इन 54 मदरसों में केवल 24 में ही छात्रों का पंजीकरण हुआ है, जबकि 30 मदरसे पूरी तरह छात्रविहीन हैं। आलिम स्तर पर पूरे प्रदेश में मात्र 83 छात्र नियमित रूप से पढ़ रहे हैं और 16 छात्र निजी परीक्षार्थी के रूप में परीक्षा में शामिल हुए हैं।

उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी ने बताया कि मान्यता बनाए रखने के लिए मुंशी-मौलवी स्तर पर कम से कम 30 छात्र होने चाहिए। उच्च कक्षाओं के लिए वर्तमान वर्ष में कम से कम 10 परीक्षार्थी परीक्षा में शामिल होना जरूरी है। वर्तमान में इन 54 मदरसों में से केवल 9 मदरसे ही मान्यता के इन मानकों पर खरे उतर रहे हैं। सरकार का उद्देश्य मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ना है। एक जुलाई से मदरसा बोर्ड खत्म होने के बाद उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया गया है, जो सभी अल्पसंख्यक संस्थानों की देखरेख करेगा। प्राधिकरण अब इन मदरसों को उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद (उत्तराखंड बोर्ड) से संबद्धता दिलाने का प्रयास कर रहा है। डॉ. गांधी ने कहा कि पहले चरण में मदरसों की समस्याओं को सुनने के लिए बैठकें आयोजित की जा रही हैं। इसके बाद संबद्धता का प्रक्रिया शुरू होगी। संबद्धता मिलने के बाद छात्रों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है। एक कमेटी भी गठित की गई है, जो तय करेगी कि धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक पाठ्यक्रम में क्या और कितना शामिल किया जाए। 1 अप्रैल 2026 से सरकारी स्कूलों में नया सत्र शुरू हो चुका है, लेकिन अब तक किसी भी मदरसे को उत्तराखंड बोर्ड से संबद्धता नहीं मिली है। ऐसे में मदरसों के छात्र कोर्स पूरा करने में पिछड़ सकते हैं। प्राधिकरण का मानना है कि बोर्ड से संबद्धता और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था अपनाने से मदरसों में नामांकन बढ़ेगा और छात्र मुख्यधारा में शामिल हो सकेंगे। यह बदलाव मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार की नीति का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचे के अनुरूप अल्पसंख्यक शिक्षा को मजबूत बनाना है। उत्तराखंड देश का पहला राज्य है, जहां मदरसा बोर्ड को पूरी तरह समाप्त कर सभी अल्पसंख्यक संस्थानों को एक छत्र प्राधिकरण के अधीन लाया जा रहा है। शिक्षाविदों का कहना है कि यह कदम लंबे समय में छात्रों के भविष्य के लिए फायदेमंद साबित होगा, हालांकि संक्रमण काल में चुनौतियां भी सामने आएंगी। प्राधिकरण छात्रों, शिक्षकों और प्रबंधकों को आश्वासन दे रहा है कि उनकी धार्मिक शिक्षा की परंपरा बनी रहेगी, साथ ही आधुनिक शिक्षा के अवसर भी उपलब्ध होंगे।