गंगोलीहाट में तीन दिन तक गूंजा विज्ञान का उत्सव: हीमोग्लोबिन से लेकर जीपीएस और दवाओं की केमिस्ट्री तक वैज्ञानिकों ने आसान अंदाज में समझाया साइंस

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गंगोलीहाट। हिमालयन ग्राम विकास समिति (एचजीवीएस) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय साइंस आउटरीच प्रोग्राम का समापन रविवार 10 मई को हुआ। इस दौरान देश के वैज्ञानिकों ने स्‍कूली छात्र-छात्राओं को विज्ञान के प्रति दिलचस्‍पी बढ़ाने का काम किया। इस दौरान केमेस्ट्री के असिस्‍टेंट प्रोफेसर डा. बीएस बिष्‍ट ने कहा कि हमारे खून में आयरन की जगह अगर मैग्‍नीशियम होता तो क्‍या होता? खून का रंग हरा होता, क्‍योंकि लाल रंग हमें ब्‍लड में मौजूद हीमोग्लोबिन जिसमें आयरन होता है वो ऑक्सीजन के साथ मिलकर रक्त को लाल रंग देता है। प्‍याज काटने पर आंसु इसलिए आते हैं क्‍योंकि उसमें सलफर होता है। उन्‍होंने ऐसे ही रोजमर्रा के जीवन में साइंस का महत्‍व समझाया और रोचक तथ्‍यों की जानकारी दी। उन्‍होंने बताया पौधों से ही बड़ी और गंभीर बीमारियों की दवाएं कारगर हुई हैं। ग्रीन टी, हरा धनियां, वाइन, हनीकी केमिकल प्रोपर्टीज के बारे में रोचक तरीके से जानकारी दी। साथ ही ऑक्‍सीटोसिनहार्मोन कब कैसे रिलीज होता है इन सबकी जानकारी दी।

गर्वनमेंट पीजी कॉलेज बेरीनाग से बॉटनी विभाग के डा. जेएन पंत ने प्‍लांट का महत्‍व, फूल वाले और बिना फूल वाले पौधों का जीवन, प्रजनन, उनकी फूड साइकिल पर चर्चा की। बच्‍चों के सवालों का जवाब भी दिया। सेंट जोसेफ विश्वविद्यालय बेंगलुरु की डा. आंचल सिंघल ने मेडिसिन, इसे बनाने में कंप्‍यूटर का इस्‍तेमाल और केमेस्ट्री में जॉब के कैसे और कहां अवसर होते हैं इसकी भी बच्‍चों को बेहतर जानकारी दी। उन्‍होंने बताया हमें किसी जगह जाना होता है तो मोबाइल में जीपीएस सिस्‍टम हमें रोड मैप बताकर उस जगह पहुंचाता है उसी तरह जब हम किसी बीमारी की दवा खाते हैं तो बाडी में मौजूद रिसेप्‍टर्स उसे जिस पार्ट में तकलीफ है, वहां की जानकारी देते हैं। कार्यक्रम के अंत में स्‍टूडेंटस, फैकल्‍टी ने कार्यक्रम से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। तीन दिवसीय साइंस आउटरीच कार्यक्रम के समापन के अवसर पर प्रो. विश्‍व मोहन पांडे, डा. विनायक पत्‍तर, प्रो. उदय कुमार रंगा, डा. अरुण पंचपाकेशन, प्रो. दुर्गेश पंत, प्रो.. चंद्रभाष नारायणन ने स्‍टूडेंटस को आशीष वचन दिए। हिमालयन ग्राम विकास समिति के अध्‍यक्ष राजेंद्र सिंह बिष्‍ट ने दिया सभी का आभार जताया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. आनंद सिंह जीना ने किया।