30 साल की सेवा के बाद पदोन्नति का हक, उत्तराखंड सरकार के अध्यादेश फैसले का शिक्षकों ने किया स्वागत

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उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में वर्षों से रुकी हुई शिक्षकों की पदोन्नति (प्रमोशन) का रास्ता अब साफ होने जा रहा है। स्कूलों में नेतृत्व और शिक्षकों की भारी कमी को देखते हुए राज्य सरकार विशेष 'अध्यादेश' लाने की तैयारी में है। बृहस्पतिवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में शिक्षा विभाग के इस प्रस्ताव पर गहन चर्चा के बाद सैद्धांतिक सहमति बन गई है। इस कदम से प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में सुधार और शिक्षकों के मनोबल को बढ़ाने की उम्मीद जताई जा रही है।

उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा संकट सामने आया है, जहां सरकारी स्कूलों में प्रधानाचार्यों और शिक्षकों के पद बड़ी संख्या में खाली पड़े हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि प्रदेश में करीब 90 प्रतिशत प्रधानाचार्य पद रिक्त हैं। इस समस्या के समाधान के लिए राज्य सरकार अब शिक्षकों की पदोन्नति के लिए अध्यादेश लाने की तैयारी कर रही है। बृहस्पतिवार को हुई कैबिनेट बैठक में शिक्षा विभाग के प्रस्ताव पर चर्चा के बाद इस दिशा में सहमति बन गई है। सरकार का मानना है कि अध्यादेश के जरिए लंबे समय से लंबित पदोन्नति प्रक्रिया को गति दी जा सकेगी और स्कूलों में खाली पदों को भरा जा सकेगा। आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में प्रधानाचार्यों के कुल 1385 पदों में से 1250 पद खाली हैं। इसी तरह प्रधानाध्यापकों के 910 में से 870 पद रिक्त हैं। इसके अलावा प्रवक्ताओं के चार हजार से अधिक पदोन्नति पद भी खाली पड़े हैं। प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूलों में भी स्थिति कुछ बेहतर नहीं है, जहां पदोन्नति के कई पद वर्षों से खाली हैं। इन रिक्तियों का सीधा असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। स्कूलों में नेतृत्व की कमी और अनुभवी शिक्षकों के अभाव के कारण शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। कई स्कूल बिना स्थायी प्रधानाचार्य के ही संचालित हो रहे हैं, जिससे प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्यों में बाधा आ रही है। शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कहा कि सरकार छात्रों और शिक्षकों के हित में हर जरूरी कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि पदोन्नति से जुड़े मामले लंबे समय से कोर्ट में लंबित हैं, जिसके कारण प्रक्रिया अटकी हुई है। ऐसे में सरकार अध्यादेश के माध्यम से सेवा नियमावली में संशोधन कर इस गतिरोध को समाप्त करना चाहती है। वहीं, पदोन्नति नहीं होने से शिक्षकों में भी भारी नाराजगी है। कई शिक्षक 30 से 32 वर्षों की सेवा पूरी करने के बावजूद बिना पदोन्नति के ही सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार चाहें तो पदोन्नति को कोर्ट के अंतिम निर्णय के अधीन रखते हुए उन्हें पदोन्नत कर सकती है, जिससे उनका मनोबल बढ़ेगा और स्कूलों में खाली पद भी भर सकेंगे। सरकार को उम्मीद है कि अध्यादेश लागू होने के बाद शिक्षा व्यवस्था में सुधार आएगा और लंबे समय से रुकी पदोन्नतियां शुरू हो सकेंगी। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यह कदम जमीनी स्तर पर कितना असरदार साबित होता है।